इतनी युवा दुनिया के नेता इतने बुजुर्ग क्यों?
और इसका सरकारों पर लोगों के भरोसे और उनके फैसलों पर क्या असर पड़ता है?

आज दुनिया भर की राजनीति पर नज़र डालें तो उसमें एक बड़ा असंतुलन साफ़ दिखाई देता है. पूरी दुनिया के नेताओं की औसत उम्र 63 वर्ष है, जबकि वैश्विक आबादी की औसत उम्र महज़ 30 साल ही है. इस मामले में कुछ अपवाद भी हैं, जैसे कि नेपाल के 36 वर्षीय प्रधानमंत्री बालेन शाह या आइसलैंड, बुर्किना फ़ासो और इक्वाडोर के राष्ट्राध्यक्ष जो महज़ 38 साल के ही हैं. लेकिन व्यापक स्तर पर राजनीति का झुकाव ‘वृद्धतंत्र’ (Gerontocracy) की ओर ही है.
इसके सबसे बड़े उदाहरण कैमरून के 93 वर्षीय पॉल बिया या सऊदी अरब के 90 वर्षीय राजा सलमान हैं, जो अपनी उम्र की तुलना में बेहद युवा आबादी पर शासन करते हैं. हालांकि, ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ तानाशाही या राजशाही व्यवस्थाओं का ही हाल ऐसा है. दुनिया के सबसे स्थापित लोकतंत्रों में भी यही ढर्रा दिखता है. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प 80 साल के पार जा चुके हैं, और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 76 साल के हैं.
किसी भी अन्य क्षेत्र में ऐसा होता तो बड़ा अजीब लगता. कोई भी बड़ी कॉर्पोरेट कंपनी 80 या 90 साल के व्यक्ति को अपना कामकाज संभालने के लिए शायद ही नियुक्त करेगी. लेकिन राजनीति एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें अजीब तब लगता है जब कोई युवा किसी महत्वपूर्ण पद पर दिखाई देता है.

