जब-जब प्रेमचंद ने क्रिकेट पर लिखा, खेल सिर्फ खेल नहीं रहा
मुंशी प्रेमचंद ने न केवल अपने साहित्य में क्रिकेट को जगह दी, बल्कि अपने अखबार में उस पर कई गंभीर लेख भी लिखे
शुभनीत कौशिक
बात है साल 1932 की. भारतीय क्रिकेट टीम इंग्लैंड के दौरे पर गई थी. पोरबंदर के महाराजा नटवरसिंहजी की अगुआई में. इस दौरे में उसने 37 मैच खेले. इनमें 26 प्रथम श्रेणी के थे, जिनमें एक टेस्ट मैच भी शामिल था. भारतीय टीम ने इनमें से नौ मैच जीते, आठ हारे और नौ बराबरी पर छूटे. उसकी इस सफलता का श्रेय दिग्गज बल्लेबाज सी.के. नायडू और दो तेज गेंदबाजों अमर सिंह और मोहम्मद निसार को दिया गया. इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने क्रिकेट के इतिहास पर एक किताब लिखी है — ‘अ कॉर्नर ऑफ अ फॉरेन फ़ील्ड’. इसमें उन्होंने इंग्लैंड को उसी की ज़मीन पर धूल चटाने वाली भारतीय टीम के बारे में लिखा है कि वह इस लिहाज़ से भी संतुलित थी कि उसमें सभी संप्रदायों के खिलाड़ी — सात हिंदू, चार मुसलमान, चार पारसी और दो सिख — शामिल थे.
महान हिंदी लेखक मुशी प्रेमचंद ने भी अपने अखबार ‘जागरण’ में भारत के इस क्रिकेट दौरे के बारे में लिखा था. 12 अक्तूबर 1932 को इसके संपादकीय में उन्होंने लिखा कि इंग्लैंड में भारतीय क्रिकेट टीम, भारतीय हॉकी टीम जितनी सफल भले न रही हो, लेकिन फिर भी उसकी सफलता छोटी नहीं है. टीम की इस उपलब्धि पर ख़ुशी जाहिर करते हुए उनका कहना था: ‘भारतीय क्रिकेट टीम दिग्विजय करके लौट आयी. यद्यपि उसे उतनी शानदार कामयाबी हासिल नहीं हुई, फिर भी इसने इंग्लैंड को दिखा दिया कि भारत खेल के मैदान में भी नगण्य नहीं है. सच तो यह है कि अवसर मिलने पर भारत वाले दुनिया को मात दे सकते हैं, जीवन के हरेक क्षेत्र में. क्रिकेट में इंग्लैंड वालों को गर्व है. इस गर्व को अबकी बड़ा धक्का लगा होगा. हर्ष की बात है कि वाइसराय ने टीम को स्वागत का तार देकर सज्जनता का परिचय दिया.’


