प्रियदर्शन
कुछ साल पहले फिल्म अभिनेता और नेता कमल हासन ने गोडसे को आजाद भारत का पहला आतंकवादी बताया था. इसके बाद भाजपा नेता प्रज्ञा ठाकुर ने नाथूराम गोडसे को देशभक्त ठहरा दिया था. उनका कहना था कि गोडसे को आतंकी कहने वालों को अपने गिरेबान में झांकना चाहिए. हिंदू महासभा से जुड़े कुछ लोग गांधी के पुतले को गोली मारने का स्वांग रच चुके हैं. कुछ समय पहले एनआईटी-कालीकट की एक प्रोफेसर ने सोशल मीडिया पर लिखा कि उन्हें ‘भारत को बचाने के लिए गोडसे पर गर्व है’. बाद में वे वहीं डीन भी नियुक्त हुईं. हाल ही में सूरत में एक प्रस्तावित कार्यक्रम के पोस्टरों पर गोडसे को ‘हिंदू हृदय सम्राट’ और ‘परम देशभक्त’ बताया गया था.
नाथूराम गोडसे भारत की सार्वजनिक बहस से कभी पूरी तरह गायब नहीं होता. वह समय-समय पर लौटता रहता है—कभी उसकी मूर्ति बनाने की मांगों में, कभी उसे देशभक्त साबित करने की कोशिशों में और कभी महात्मा गांधी की हत्या को सही और उन्हें गलत ठहराने वाले तर्कों में.
गोडसे पर बार-बार लौटने वाली यह बहस दरअसल गोडसे से ज्यादा गांधी के बारे में ही है. बल्कि इस बहस में गोडसे की जरूरत गांधी और उनके विचारों को खारिज करने के लिए ही पड़ती है.
एनसीईआरटी के प्रमुख रहे सुख्यात शिक्षाशास्त्री कृष्ण कुमार ने अपनी किताब ‘शांति का समर’ में एक बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल उठाया है— राजघाट ही हमारे लिए गांधी की स्मृति का राष्ट्रीय प्रतीक क्यों है, वह बिड़ला भवन क्यों नहीं है जहां महात्मा गांधी ने अपने आखिरी दिन गुजारे और जहां उनकी हत्या कर दी गई? जब बाहर से कोई आता है तो उसे राजघाट क्यों ले जाया जाता है, बिड़ला भवन क्यों नहीं? कृष्ण कुमार इस सवाल का जवाब…


