एक अदना सी लिपस्टिक नारीवाद का पूरा फ़लसफ़ा क्यों है?
लिपस्टिक ही नहीं उसका रंग भी महिलाओं के प्रति समाज की सोच तय करता है. शायद इसीलिए नारीवाद का एक दौर लिपस्टिक फेमिनिज्म कहलाता है और साल का एक दिन लिपस्टिक डे

साल 2017 में आई फिल्म लिपस्टिक अंडर माय बुर्का शायद उस साल की सबसे विवादित फिल्म थी. फिल्म को 2016 में रिलीज होना था लेकिन अपने बोल्ड मिजाज के चलते वह नये जमाने के सेंसर बोर्ड की नजरों में खटक गई. इसके बाद भारी खींचतान के बाद वह किसी तरह से रिलीज हो सकी.
नारीवाद की जोरदार आवाज बनने वाली इस फिल्म के अजीब से नाम पर गौर करें तो पूछ सकते हैं कि आखिर बुर्के के अंदर लिपस्टिक लगाने का क्या मतलब है? बुर्का पहनने के बाद तो वह वैसे भी नहीं दिखेगी. इस पर ‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’ की निर्देशक अलंकृता श्रीवास्तव का कहना था कि ‘यह फिल्म महिलाओं की दबी-छुपी इच्छाओं, कल्पनाओं और सपनों की बात करती है, इसलिए इसे यह शीर्षक दिया गया है. बुर्के के पीछे छिपी लिपस्टिक की तरह ही महिलाओं की हसरतों का पता किसी को नहीं चल पाता है लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि वे उन्हें पूरा करने की कोशिश नहीं करती हैं. यानी, यह लिपस्टिक प्रतीकात्मक है.’
लेकिन यह कोई पहला मौका नहीं था जब लिपस्टिक को फेमिनिज्म के किसी प्रतीक की तरह इस्तेमाल किया गया था. लिपस्टिक नारीवाद का हिस्सा कुछ इस तरह बन चुकी है कि अब बाकायदा इसके लिए साल का एक दिन — 29 जुलाई — निर्धारित है. जैसे वीमेंस डे, योगा डे, वैलेंटाइंस डे; वैसे ही लिपस्टिक डे. इस दिवस की शुरुआत के बारे में कई मत हैं. कुछ जानकार इसे दशकों की परंपरा बताते हैं तो कुछ इसे सिर्फ दस साल पुराना ही मानते है. दरअसल लिपस्टिक डे को वैश्विक और आधिकारिक पहचान साल 2016 में तब मिली, जब मशहूर मेकअप आर्टिस्ट और ‘हुडा ब्यूटी’ की संस्थापक हुडा कटैन ने इसे ‘नेशनल डे कैलेंडर’ में रजिस्टर करवाया. तभी से कटैन को इस दिवस के ‘आधुनिक संस्थापक’ के रूप में जाना जाता है.

