क्या चीन के मामले में नेहरू जी से बड़ी गलतियां मोदी जी ने की हैं?
जवाहरलाल नेहरू की समस्या यह थी कि वे सिर्फ अपनी गलतियों से सीख सकते थे, लेकिन नरेंद्र मोदी शायद अपनी गलतियों से ही सीखना चाहते हैं

पूर्व सेनाध्यक्ष मनोज मुकुंद नरवणे ने अपने संस्मरण — फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी — में लिखा है कि उन्हें 31 अगस्त 2020 को रात सवा आठ बजे यह जानकारी मिली कि चीनी सेना अपने टैंकों के साथ पूर्वी लद्दाख के रेचिन ला दर्रे की ओर बढ़ रही है. एलएसी (लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल) पर स्थित इस ऊंचे इलाके को भारतीय सेना ने एक दिन पहले ही अपने कब्ज़े में लिया था. रेचिन ला उस रेजांग ला दर्रे के बगल में है, जहां 1962 की लड़ाई के दौरान सिर्फ़ 120 भारतीय सैनिकों ने हजारों चीनी सैनिकों का मुकाबला किया था. इस लड़ाई में 114 भारतीय और भारी संख्या में चीनी सैनिकों ने अपनी जान गंवाई थी. इस पर हाल ही में एक हिंदी फ़िल्म भी बनी है — 120 बहादुर.
जब चेतावनी के बाद भी चीनी सेना नहीं रुकी तो जनरल नरवणे ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल, विदेश मंत्री एस जयशंकर और तब के चीफ ऑफ डिफ़ेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत को फोन किए. इन सबसे उन्होंने एक ही बात पूछी — “मेरे लिए क्या आदेश है?”
प्रोटोकॉल के मुताबिक़ भारतीय सेना तब तक चीनी सिपाहियों पर गोली नहीं चला सकती थी, जब तक इसका आदेश उसे शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व से न मिल जाता. नरवणे अगले दो घंटों तक लगातार फोन करते रहे, लेकिन उन्हें सरकार की तरफ से कोई आदेश नहीं मिला. तब तक चीनी सेना भारतीय सेना के बिल्कुल नजदीक आ चुकी थी. अंत में, सवा दो घंटे बाद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह आदेश उन्हें दिया कि “जो उचित समझो, वो करो.”
इसके बाद जनरल एमएम नरवणे ने अगले कुछ मिनटों में कोविड से उपजी परिस्थितियों, दुनिया भर के हमारे सहयोगियों-विरोधियों और देश की तैयारियों का आकलन करने के बाद जो सही था, वह बिलकुल सही किया.
यहां तीन-चार बेहद महत्वपूर्ण सवाल उठते हैं:
1- इतने और इस तरह के विषयों पर विचार करना किसी आर्मी जनरल का अकेले का काम नहीं हो सकता. तो प्रधानमंत्री ने भले सीधा आदेश न दिया हो, लेकिन रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने — जो कैबिनेट की सुरक्षा समिति के सदस्य भी हैं — उचित-अनुचित का निर्णय लेने में जनरल नरवणे की मदद क्यों नहीं की?
2- जब एक दिन पहले ही सेना ने रेचिन ला को अपने कब्ज़े में लिया था, तो जाहिर था कि चीन भी इसकी प्रतिक्रिया में कुछ कर सकता था. तो फिर भारत को उसका जवाब कैसे देना है, इस पर पहले से विचार क्यों नहीं किया गया?
3- इससे महज़ दो महीने पहले ही गलवान घाटी की घटना हो चुकी थी. इसमें 20 भारतीय सैनिक शहीद हुए थे और दशकों बाद पहली बार चीनी सैनिकों के भी मारे जाने की पुष्टि हुई थी. इसके लिए चीन भारत को ही जिम्मेदार ठहरा रहा था. ऐसे माहौल में क्या हमें अतिरिक्त सतर्कता नहीं बरतनी चाहिए थी?
4- और अगर 1-2-3 बिंदुओं में से कुछ भी नहीं किया जा सका, तो “जो उचित समझो, वो करो” कहने में सवा दो घंटे क्यों लगाए गए - वह भी तब, जब एक-एक मिनट बेहद कीमती था?

