चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दिल्ली में हो रहे प्रदर्शनों के बारे में एक बात आसानी से कही जा सकती है—वे शांतिपूर्ण हैं. लोग नारे लगा रहे हैं, पोस्टर लिए हुए हैं, सवाल पूछ रहे हैं. लेकिन इनमें ऐसी कोई हिंसा, पत्थरबाज़ी या तोड़फोड़ नहीं दिखती जिसकी वजह से प्रदर्शनकारियों को ऐसी जगह जाकर प्रदर्शन तक न करने दिया जाए जो इसी काम के लिए है. लेकिन उन्हें जंतर-मंतर तो छोड़िए, उसके आस-पास भी नहीं पहुंचने दिया जा रहा है.
दिल्ली पुलिस ने दो अक्टूबर को सैकड़ों लोगों को हिरासत में लिया. तीन अक्टूबर को भी ऐसा ही किया. फिर छह और सात अक्टूबर को नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और बड़ी संख्या में विपक्षी सांसदों के साथ भी ऐसा ही हुआ. राहुल गांधी और प्रियंका गांधी सहित जिसने भी इसका विरोध किया, उसे दिल्ली पुलिस ने अपनी चिर-परिचित ताक़त से जवाब दिया. इसके बावजूद प्रदर्शन सामान्यतः अहिंसक ही रहे. फिर भी इन्हें आगे न होने देने के लिए सेना बुलाने के सिवाय लगभग हर उपाय किया जा रहा है.
यहां एक बहुत साधारण सा सवाल पैदा होता है: चुनाव आयोग से पूछे जा रहे सवालों का जवाब पुलिस के जरिये क्यों दिया जा रहा है?
पुलिस यह नहीं बता सकती कि चुनाव आयोग के दो सदस्यों ने बार-बार आयोग के निर्णयों के खिलाफ अपनी लिखित आपत्तियां क्यों दर्ज़ कीं. वह यह नहीं बता सकती कि लोगों को मताधिकार देने वाला फॉर्म-6 किसने बदला और इसके क्या परिणाम हो सकते हैं. पुलिस यह नहीं बता सकती कि पश्चिम बंगाल में न्यायिक अधिकारियों ने लाखों मतदाताओं के नाम सूची में बनाए रखने का फैसला किया तो आयोग उन्हें फिर से हटाने पर क्यों तुला हुआ है. वह यह भी नहीं बता सकती कि मतदाता सूची में लोगों के नाम केवल दिल्ली से ही क्यों जोड़े जा रहे हैं जबकि कानूनन यह काम देश भर में फैले ईआरओ का है. यह भी कि चुनाव आयोग के तीनों सदस्य अब आपस में मिलते और मिलकर फैसले क्यों नहीं लेते. और पुलिस यह कैसे बताएगी कि इतिहास में पहली बार दो चुनाव आयुक्तों ने आयोग में चल रही अव्यवस्था के ख़िलाफ़ कैबिनेट सचिव को पत्र किस मजबूरी की हालत में लिखा था.
इन सवालों के जवाब केवल चुनाव आयोग दे सकता है, पुलिस या केंद्रीय सुरक्षा बल नहीं और न ही मोदी सरकार. लेकिन हालत यह है कि आयोग पर उठ रहे सवालों के सिर्फ राजनीतिक जवाब मिल रहे हैं. ये जवाब कभी भाजपा के प्रवक्ता दे रहे हैं कभी विभिन्न राज्यों के उसके मुख्यमंत्री. बस चुप है तो चुनाव आयोग और इसका विरोध जताने पर इनका जवाब दिल्ली पुलिस अपने ही ढंग से दे रही है.
मोदी सरकार को भी इस मामले से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवालों के जवाब देने हैं. लेकिन फिलहाल वह चुनाव आयोग की न बोलने की आज़ादी की रक्षा के लिए …


