‘चौं लल्ला, दसैरा कब है?’
‘का अम्मा, तुमओ कमाल कर देत. नेक ऐसे पूछतीं—कब है दसैरा, कब?’
‘जामे का फरक है?’
‘फरक है अम्मा. मैंने तुमें बो सिनेमा दिखाओ ना, जाको नाम सोले हतो? बामे एक डाकू ओ, जाको नाम गब्बर सिंह हतो. नेक बा की तरियां बोलतीं—कब है दसैरा, कब?’
‘ऐ नासपीटे! तोमे दउं लट्ठ. कछु कामकाज करै नाय, सिलेमा देखत-देखत टैम खराब कर रओ है, हरामजादो.’
‘सनीचर... को... दसैरा है...’

इससे पहले कि अम्मा उसे ईंट दे मारतीं, बब्बू खां चिल्लाता हुआ घर से निकल भागा. हैरान आंखों से जमीला बानो बब्बू को जाते हुए देख रही थीं. न उनके पास गाली देने के अलावा कोई चारा था, न बब्बू के पास करने के लिए कोई काम.
मरहूम पोस्टमास्टर नत्थू खां की आधी-पर्दी पेंशन से ही उनका गुजारा हो रहा था. जमीला बी दिन भर बब्बू को गालियां देतीं, अपनी किस्मत कोसती रहतीं और बब्बू बस नाटक-नौटंकी करता रहता. पर था वो एक मंझा हुआ कलाकार.
‘बब्बू सुनोबे, रामलीला को दिन आबे बारो है. तुम पूरा जोर लगा देना. दसेरा बारे दिन पूरा सुल्तानगंज जुटेगा और तुम हमारे राम हो. बेटा, सब दारोमदार तुम पर है. जरा बढ़िया से एक्टिंग-फैक्टिंग करियो. कोई कमी ना रह जाए.’
‘फिकर मत करो, गुरजी. मैं तुम्हारो चेला हूं, कोई कमी नाय छोड़ूंगो.’
दशहरे की तैयारी लगभग पूरी हो चुकी थी. हर तरफ गहमागहमी का माहौल था, पर पहले वाली बात अब नहीं थी. सुल्तानगंज में अब मुसलमान रामलीला देखने नहीं आते थे. ईद पर हिंदू भी कम ही घर से निकलते और मुसलमानों के गले लगकर उन्हें बधाई देते थे. कुछ बदल-सा रहा था और यह बब्बू भी महसूस कर रहा था…


